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छत्तीसगढ़ जर्नलिस्ट वेलफेयर यूनियन के जिलाध्यक्ष बलराज नायडू को न्यायालय ने सुनाई 2 साल की सजा

 बलराज नायडू के द्वारा शासन के साथ छल कर शासकीय भूमि को कम्प्यूटर डॉटा मे रामनारायण के नाम पर दर्ज किया गया हैं 

ना‌मदेव साहू छत्तीसगढ़ संपादक 

महासमुंद= पिथौरा न्यायालय ने 28 नवम्बर को पिथौरा थाने में दर्ज वर्ष 2015 के अपराध क्रमांक 56/2015 में अपना फैसला देते हुए एक आरोपी को दोषी पाया है जिसे 2 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई है. मामले में दोषी बलराज नायडू वर्त्तमान में छत्तीसगढ़ जर्नलिस्ट वेलफेयर यूनियन के जिला अध्यक्ष हैं, जिन्हें न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतीक टेम्भुरकर ने प्रकरण में साक्ष्य विश्लेषणों के निष्कर्ष पर दोषी पाया है. न्यायालय के इस फैसले से चौकाने वाले खुलाशे हुए हैं, जिसमें यह बताया गया है कि बलराज नायडू ने स्वयं को पटवारी के रूप में प्रतिरूपण कर अनाधिकृत रूप से भुईया शाखा में प्रवेश कर डाटा एंट्री ऑपरेटर लीलाधर प्रधान को कंप्यूटर में राजसवैया खुर्द के खरसा नंबर 08 रकबा 1.74 शासकीय भूमि को रामनारायण के नाम पर दर्ज करने को कहा जिसपर लीलाधर प्रधान ने बलराज के कहने पर उस शासकीय भूमि को रामनारायण के नाम पर दर्ज कर दिया. और इसके बाद 2 जनवरी को बलराज ने महासमुंद कलेक्टर को राजसवैया खुर्द के पटवारी को फंसाने के उद्देश्य से उसके खिलाफ शासकीय भूमि को गलत ठंग से निजी स्वामी के नाम पर चढ़ाने की शिकायत की. इसके बाद 1 अप्रैल को अनुविभागीय अधिकारी राजस्व पिथौरा को डाक के माध्यम से एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमे बलराज के विरुद्ध शिकायत थी. जिसमे बताया गया कि बलराज नायडू के द्वारा शासन के साथ छल कर शासकीय भूमि को कंप्यूटर डाटा में रामनारायण के नाम पर दर्ज किया गया है. जिसपर अनुविभागीय अधिकारी ने पिथौरा थाने में बलराज नायडू के विरुद्ध धारा 420, 468 और 471 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर जाँच प्रारंभ किया. और मामले में अनुविभागीय अधिकारी सहित सम्बंधित पटवारी व डाटा एंट्री ऑपरेटर से बयान लिए गए. डाटा एंट्री ऑपरेटर लीलाधर ने बताया कि वर्ष 2015 में राजस्व अभिलेखों कंप्यूटर में डाला जा रहा था, तहसील में कई ऐसे पटवारी थे जिन्हें कंप्यूटर चलाना नहीं आता था जिसक चलते एक पटवारी पुरुषोत्तम बरिहा ने कंप्यूटर में डाटा डालने हेतु निजी तौर पर अपनी मदद के लिए लीलाधर को रखा था. कंपूटर में भू-अभिलेखों का डाटा डालने हेतु पासवर्ड की जरुरत होती थी, जिसे लीलाधर को प्रदान किया गया था. हलाकि लीलाधर की नियुक्ति शासकीय नहीं थी, लेकिन पुरुषोत्तम के कहने पर वह वहां डाटा एंट्री करने का काम करता था.

  लीलाधर ने बताया कि भुइंया शाखा संवेदनशील होने की वजह से वहां बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश अनधिकृत था. उसे और भी कई पटवारी कई बार डाटा डालने को कहते थे जिनके कहने पर वह डाटा डाल दिया करता था और इसकी जानकारी उसे किसी को नहीं देनी पड़ती थी. और इस बात की जानकारी बलराज को भी थी. लीलाधर ने बताया कि बलराज भुइयां प्रभारी अनिल के साथ वहां बार-बार आता था, चूँकि भुइंया शाखा में केवल पटवारी ही आते थे कोई बाहरी नहीं आता था इसलिए लीलाधर ने बलराज को पटवारी समझ लिया और बलराज द्वारा एक ऋण पुस्तिका के आधार पर खसरे की नकल निकालने के बहाने से डाटा एंट्री ऑपरेटर लीलाधर से कंपूटर में शासकीय भूमि को रामनारायण के नाम पर दर्ज कर दिया. बलराज के भुईया शाखा सामान्य तौर पर आने-जाने से वहां उपस्थित डाटा एंट्री आपरेटर उसे पटवारी समझा करते थे.

आखिर क्या था बलराज के इस शिकायत के पीछे का उद्देश्य ?

दरअसल राजासेवैया खुर्द में बलराज के पिता के नाम पर खसरा नंबर 08 रकबा 1.74 के बगल में 5 एकड़ की जमीन है. यदि खसरा नंबर 08 रकबा 1.74 बलराज के पिता के नाम पर हो जाती तो उनके जमीन की कीमत और भी कहीं बढ़ जाती, जिसके चलते बलराज ने उस जमीन पर अपने पिता के नाम से नाजायज कब्ज़ा तहसीलदार को दिखाकर विवादग्रस्त भूमि को उसके नाम पर करने बोला. जिसे पटवारी द्वारा इंकार कर दिया गया. इसके बाद पटवारी जब भुइयां प्रभारी के रूप में पदभार ग्रहण कर भुइया कक्ष में आया तो वहां बलराज एक ऑपरेटर के साथ अनाधिकृत रूप से बैठे मिला तथा उक्त पटवारी द्वारा भुईया शाखा में बलराज के आना-जाना रोक दिया. तो बलराज उक्त पटवारी को शिकायत किये जाने की धमकी देकर वहां से चला गया. बलराज ने पटवारीयो के विरूद्ध शिकायत करने की नियत से विवादग्रस्त भूमि की प्रविष्टीया भुईया अभिलेख में रामनारायण पिता रतिराम के नाम पर करवाई. जिससे पटवारीयो को क्षति या क्षोभ हो. मामले ने न्यायालय ने बलराज नायडू को धारा-182, 419, 465 एवं 471 भा०दं०वि0 के आरोप में दोषसिद्ध पाते हुए, उसे 2 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई.

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