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केशरपाल सरस्वती शिशु मंदिर में मनाया गया श्रीकृष्ण जनमोत्स्व कार्यक्रम

                          बस्तर (केशरपाल )पूरे देश मे कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है । इसी तारतम्य में  बस्तर के  केशरपाल सरस्वती शिशु मंदिर में कृष्ण  जनमोत्स्व मनाया गया  सर्वप्रथम शाला अभिभावक के अध्यक्ष उपाध्यक्ष ने दीप प्रज्वलित कार्यक्रम का सुभारम्भ किया।  बच्चों के द्वारा  भजन , प्रस्तुत कर भव्य  शोभा यात्रा निकाला गया । सांस्कृतिक ,कार्यक्रम में रंग बिरंगा डांडिया नृत्य , व विभिन्न कार्यक्रम के माध्यम से सुंदर प्रस्तुति दिया।

हरि सिंह ठाकुर जिला ब्यूरो बस्तर

साथ ही बच्चों के द्वारा  मटकी फोड़ कार्यक्रम किया गया आपको बता दे कि श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को हुआ जिसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं। इसी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। वासुदेव और देवकी के अष्टम पुत्र के रूप में श्री नारायण ने अवतार स्वरूप में कृष्ण का मानव अवतार लिया इसीलिए सारे देश में बड़ी धूमधाम से इस तिथि को मनाया जाता है।

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की जन्म संबंधी कथा भी सुनते-सुनाते हैं, जो इस प्रकार है=  द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी से हुआ था। 

एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था रास्ते में आकाशवाणी हुई- 'हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?' कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया  उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।


वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ 'माया' थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।

तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।'

उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।


अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है।  उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।' यह है कृष्ण जन्म की कथा इसीलिए जब धर्म कि रक्षा के लिए भगवान इस धरती पर आए तो लोगो ने इसे अधर्म के उपर धर्म कि विजय स्वरूप लिया और इस दिन कि हर्ष उल्लास के साथ मनाने लगे।

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