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चिकित्सा व्यापार नहीं अपितु पवित्र सेवा कार्य

 डॉ मानस सतपथी का अनुकरणीय उदाहरण 

महासमुंद = जीवन जीने का नाम है, जिसने जीना सीख लिया उसका जीवन सुखमय एवं खुशहाल हो जाता है,जीना सीखना अपने आप में एक सतत् कार्य है,सार्थक दिशा में किया गया सतत् प्रयास ही इंसान को सार्थकता प्रदान करता है,और यह सार्थकता ही आनंद की अनुभूति कराती है,आनंद की इसी अनुभूति को ही हमारे धर्मशास्त्रों में प्रेरणाप्रद कार्य की संज्ञा दी गई है,

आज की एक ऐसे वाकया सुनाने जा रहा हूं,इस वाकया में जीवन जीने की कला है,जीवन-आनंद है,यह घटना आज के युवाओं को लिए प्रेरणा बन सकती है, सच कहा गया है, मेहनत एवं ईमानदारी का रंग दिखने में बेसक समय लगे, लेकिन दिखता जरूर है, जी हां,, तभी तो डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहा गया है, हम बात कर रहे हैं ग्राम तोषगाव के डॉक्टर मानस अंकुर सतपथी की, इन्होंने न केवल अपने  चिकित्सीय धर्म की पालन की बल्कि इंसानियत को जिंदा करते हुए एक ऐसे मरीज की सेवा की जिसके पास आम आदमी भी नही जाते है। 

मेडिकल कॉलेज जिला अस्पताल में पदस्थ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. मानस अंकुर सतपति ने मानवता का परिचय देते हुए ग्राम तोषगांव बड़ा तालाब पदमपुर रोड स्थित शिव मंदिर के बाजू रोड के किनारे गार्डन में कई सालों से निवास कर रहे जख्मी पुजारी का इलाज किया। उसके जांच में घाव हो गया है।.

आने जाने में परेशानी होती है, इसलिए वे जख्मी पड़े थे। चिकित्सक जब दशकर्म कार्यक्रम के तहत तालाब पहुंचे तो उनकी नजर पड़ी और मानवता का परिचय देते हुए उन्होंने बाबाजी का ड्रेसिंग व उपचार चिकित्सक ने दूसरे दिन सोमवार को भी तालाब पहुंचकर उनकी ड्रेसिंग की। चिकित्सक मानस अंकुर सतपति कहते है कि जीवन जीने का नाम है, जिसने जीना सीख लिया उसका जीवन सुखमय एवं खुशहाल हो जाता है। उन्होंने बताया कि वह पूज्य सत्यप्रकाश सतपथी (सत्या गुरुजी) के किया। दशकर्म में सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए गांव के बड़ा तालाब पदमपुर रोड स्थित शिव मंदिर के बाजू में रोड के किनारे गार्डन में पहुंचे थे, जहां उनकी नजर एकांत में रह रहे पुजारी पर पड़ी और फिर उन्होंने उनका इलाज किया।

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